में किसी को स्पष्ट बहुमत के संकेत नहीं; तेलंगाना में TRS की वापसी

में चुनाव हुए थे। इन पांच में से तीन राज्यों में भाजपा सत्ता पर काबिज है। तेलंगाना में टीआरएस तो मिजोरम में कांग्रेस की सरकार है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा 15-15 साल से सत्ता में है और उसे एंटी इंकमबेंसी का डर सता रहा है। कांग्रेस भी इसी से उत्साहित होकर जीत के दावे कर रही है। दूसरी तरफ, तेलंगाना में चंद्रशेखर राव ने सियासी दांव चला और विधानसभा आठ महीने पहले ही भंग कर चुनाव करा लिए। टीआरएस को सत्ता में वापसी की उम्मीद है। मिजोरम नॉर्थ ईस्ट का अब अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की सरकार है। देखना होगा कि यहां क्या होगा।

लोकसभा चुनाव पर होगा असर?

इसमें कोई दो राय नहीं कि इन चुनावों में जीत हासिल करने वाली पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना दावा ज्यादा दमखम से ठोकेगी और उसके प्रचार में भी आक्रमकता देखी जाएगी। हालांकि, ये भी सही है कि लोकसभा चुनाव के मुद्दे और समीकरण दोनों अलग होते हैं, लेकिन चूंकि ये परिणाम ताजे रहेंगे लिहाजा इनका कुछ असर तो लोकसभा चुनाव पर संभव हो ही सकता है। तीन हिंदीभाषी राज्यों में भाजपा सत्ता में है और अगर यहां नतीजे उसके हिसाब से नहीं आते तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा। वहीं, अगर कांग्रेस जीतती है तो राहुल गांधी का पार्टी और देश की राजनीति में दबदबा बढ़ेगा। बहुप्रतीक्षित महागठबंधन के नेता के तौर पर भी उनका दावा मजबूत हो जाएगा।

आडवाणी की सीट से वाजपेयी लड़े, जीते

कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस (तिवारी) पार्टी बनाने वाले दिग्गज नेता तिवारी और अर्जुन सिंह दोनों चुनाव हार गए। तिवारी झांसी से लड़े और पांचवें स्थान पर रहे। वहीं अर्जुन सिंह सतना से हार गए। अर्जुन सिंह को बसपा के सुखलाल कुश्वाह ने हराया। अर्जुन सिंह तीसरे स्थान पर रहे। चुनाव में तिवारी कांग्रेस के सिर्फ दो सांसद सतपाल महाराज और शीशराम ओला ही जीते।

राजीव गांधी हत्याकांड की जांच के लिए स्थापित जैन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस ने इंद्रकुमार गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चे की सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की। जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट लीक होने से इस बात का पता चला था कि डीएमके और इसके नेतृत्व की श्रीलंका के लिट्टे नेता वी. प्रभाकरन को प्रोत्साहन देने में भूमिका थी। हालांकि रिपोर्ट में राजीव गांधी की हत्या के संबंध में डीएमके के किसी भी नेता या किसी भी पार्टी का सीधे नाम नहीं था।

लालकृष्ण आडवाणी का नाम हवाला कांड में आने के बाद उन्होंने घोषणा की कि जब तक मैं निर्दोश साबित नहीं होता, तब तक चुनाव नहीं लडूंगा। इसके बाद उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़ा। वहां से अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़े। वाजपेयी लखनऊ से भी जीते। बाद में उन्होंने गांधीनगर सीट से इस्तीफा दे दिया।

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