हाथियों की कनसुनी करने से उनको मिलती सुरक्षा
संकट में पड़े वन्य जीवों की संरक्षा एक खर्चीला और समय लेने वाला काम है. लेकिन नई टेक्नोलॉजी से जानवरों की रक्षा करना और शिकारियों को पकड़ना आसान हो सकता है.
सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में वर्षा वनों को साफ कर एक जगह से धीमे स्वर में गड़गड़ाहट गूंजती है. पेड़ों के पीछे से भी कभी-कभी जंगल को चीरती हुई दहाड़ और कानों में गूंजने वाला विलाप निकलता है.
ये आवाज़ें इस ऊष्णकटिबंधीय भू-दृश्य पर बसने वाले जंगली हाथियों की आवाजें हैं. घने पेड़े-पौधों से छुपे ये हाथी पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के सवाना में मिलने वाले अपने भाईयों से छोटे और अधिक रहस्यमय होते हैं.
आमतौर पर ये दिखने से अधिक सुनाई देते हैं, लेकिन बढ़ते हुए शिकार से कम होती इनकी आबादी ने इन्हें संकट में डाल दिया है.
अब इन छुपे रुस्तम हाथियों द्वारा घने जंगल में एक-दूसरे से सम्पर्क में रखने के लिए निकाली गई आवाज़ें शोधकर्ताओं को इन जीवों को सुरक्षित रखने का उपकरण प्रदान कर रही हैं.
इन हाथियों की आवाज़ों की गुत्थी सुलझाने में लगी एक टीम में शामिल कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी पीटर रेगे बताते हैं, "हमारा उद्देश्य पृथ्वी के दूसरे सबसे बड़े ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों में भ्रमण करने वाली एक प्रमुख प्रजाति, इन जंगली हाथियों को बेहतर ढंग से समझना और उनकी रक्षा करना है. अस्तित्व बनाए रखने के उनके अवसर में सुधार के लिए हम टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं और इस तरह उनके वन की जैव विविधता को हम संरक्षित कर रहे हैं."
हाथियों का अस्तित्व बचाने के लिए काम करने वाली एक कंपनी कंज़र्वेशन मेट्रिक्स के साथ रेगे और उनके सहयोगियों ने मिलकर टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना शुरू किया.
इनका उद्देश्य हाथियों की स्थिति का पता लगाना - इनकी हत्या करने वाले शिकारियों को ढूंढना- जिससे कि जानवरों को सुरक्षित रखा जा सके. रीग और उनके सहयोगियों ने मध्य अफ्रीका के जंगलों से नौ लाख घंटों की रिकॉर्डिंग एकत्र की है जिनमें से हज़ारों घंटों की रिकॉर्डिंग में हाथियों की बातचीत के अंश हैं.
जैसे कि इन लोगों ने पाया कि छोटी आवृत्ति वाली गड़गड़ाहट की आवाज़ समूह को एक दूसरे के संपर्क में रखती है जबकि लम्बी आवृत्ति वाली बार-बार होने वाली गड़गड़ाहट अभिवादन का संकेत है.
इस तरह की अन्तर्दृष्टि हाथियों के संचार तंत्र के बारे में सुराग देती है, बल्कि सेंसरों द्वारा हाथियों की चेतावनी की आवाज़ या शिकारियों द्वारा की जाने वाली बंदूक की आवाज़ और बातचीत से वन रक्षकों को कुछ गड़बड़ होने की अग्रिम चेतावनी भी दे देती है.
रेगे का कहना है,"अभी यह देखना बाकी है कि क्या टेक्नोलॉजी अर्थपूर्ण भू-दृश्य के स्तर पर इनकी सुरक्षा संभव कर पाएगी - दसियों हजार किलोमीटर में फैले ऐसे क्षेत्र में जहां आम तरीके काम ही नहीं करते."
लेकिन शोधकर्ताओं ने शुरूआत बहुत अच्छी की है. उनके सबसे बड़े वर्तमान प्रोजेक्ट में 50 सेंसरों के एक बड़े ग्रिड की मदद से 1243 वर्ग किलोमीटर (480 वर्ग मील) में फैला जंगल शामिल है जिसमें हर तीन-चार महीने में होने वाली रिकॉर्डिंग 20 लाख गानों और आवाज़ों के बराबर है.
डीप लर्निंग नामक आर्टिफिशियल इंटलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से इतनी अधिक रिकॉर्डिंग और हाथियों की लगभग 15 हज़ार आवाज़ों का विश्लेषण करीब-करीब 22 दिनों में किया जा सकता है.
रेगे और उनके सहयोगी अब तत्काल जानकारी के लिए नमूनों का परीक्षण कर रहे हैं. अपने एआई फॉर अर्थ यानी पृथ्वी के लिए आर्टिफिशियल इंटलिजेंस कार्यक्रम की तरह ही 200 अन्य शोधों को मदद करने वाली माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मुख्य पर्यावरण अधिकारी लुकास जोप्पा बताते हैं, "एआई इन सब चीज़ों में हम लोगों को बहुत अधिक कार्यकुशल बना देती है. कोई भी इंसान बैठकर एक ऐसी भाषा में गाए गए उन 20 लाख गीतों को नहीं सुन सकता जिसकी भाषा ही वो नहीं समझता."
आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
संरक्षणकर्ता अब अधिक से अधिक टेक्नोलॉजी की क्षमता का सहारा लेकर अकल्पनीय रूप से अपने कार्य का विस्तार कर रहे हैं. जोप्पा के अनुसार आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
वे कहते हैं, "हम बहुत लम्बे समय से मशीन लर्निंग और संरक्षण की बात कर रहे थे. लेकिन पिछले कई वर्षों में हमने न केवल कोर लेवल एल्गॉरिथम - डीप न्यूरल नेटवर्क जैसी चीजों - में अविश्वसनीय प्रगति की है बल्कि संरक्षण के क्षेत्र में एल्गॉरिथम प्रशिक्षण के मामले में भी हम बेहतर हुए हैं."
मशीन लर्निंग और अन्य प्रकार के आर्टिफिशियल इंटलिजेंस हमें कैमरा ट्रैप, ध्वनि रिकॉर्डरों, सेंसरों, मानव निर्मित उपग्रहों और जंगलों में काम करने वाले लोगों से बड़े पैमाने पर मिलने वाले आंकड़ों के विश्लेषण का एक माध्यम उपलब्ध कराते हैं.
इस सारी जानकारी का विश्लेषण यदि कोई व्यक्ति करने बैठ जाए तो बहुत समय लग जाएगा. लेकिन आर्टिफिशियल इंटलिजेंस की मदद से यह केवल कुछ बटन दबाने से ही पूरा हो जाएगा.
एआई संरक्षणकर्ताओं को वह कुशलता और अनुपात उपलब्ध कराती है जिससे प्राकृतिक संसार में उन्हें अभूतपूर्व अन्तर्दृष्टि मिल जाती है, और इससे उनके कार्यक्षेत्र की पुरानी समस्या - जनधन की कमी - भी दूर हो जाती है.
हेलसिंकी विश्वविद्यालय के संरक्षण वैज्ञानिक एनरिको डी मिनिन इसके बारे में कहते हैं, "यदि संरक्षण के लिए संसाधन पर्याप्त होते, तो हम जैव विविधता के संकट का सामना न कर रहे होते."
डी मिनिन ऐसे मशीन लर्निंग एल्गोरिथम बना रहे हैं जो सोशल मीडिया पर अवैध वन्य जीव व्यापार से संबंधित पोस्ट की पहचान करने की क्षमता रखते हैं.
वे नैचुरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग, जो कि एआई का एक ऐसा रूप है जिससे मशीनें लिखित या मौखिक भाषा से जानकारी निकाल सकती हैं, का प्रयोग इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्मों पर आए संदेशों की भावना समझने के लिए कर रहे हैं.
जैसे कि आरम्भ में इस पद्धति से चीन और वियतनाम जैसे स्थानों में गैंडे के सींग के प्रयोग के बारे में आमराय जानने में मदद मिलेगी. उसके बाद इस जानकारी का उपयोग ऐसे प्रचार डिजाइन करने में किया जा सकेगा जिससे गैंडे के सींगों की मांग घटाई जा सके.
भविष्य में शायद कानून लागू करने संबंधी एजेन्सियां भी इस कार्यक्रम का उपयोग कर ऐसे देशों की पहचान कर सकेंगी जहां जानवरों का शिकार होता है और जहां शिकार के उत्पादों को प्रयोग में लाया जाता है. इससे इस व्यापार में उभरने वाले ट्रेंड यानी प्रचलन की पहचान हो सकेगी.
डी मिनिन बताते हैं, "मौजूदा काम में एजेन्सियों को सब कुछ हाथ से करना पड़ता है. एआई की मदद से हम अगले स्तर पर पहुंच जाएंगे जिसमें तुरंत संकट का विश्लेषण किया जा सकेगा."
इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
यहां से संभावनाएं विस्तृत ही होंगी. उदाहरण के लिए वाइल्ड मी नामक लाभ निरपेक्ष संगठन चीता, जिराफ, जेब्रा, ह्वेल शार्क और अन्य जीवों की कैमरा तस्वीरों और नागरिक वैज्ञानिकों द्वारा खींचे गए फोटो से कम्प्यूटर विज़न एल्गोरिथम का उपयोग कर तुरंत पहचान बता रहा है. इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
सिएटल में वल्कान इंक के लिए संरक्षण प्रौद्योगिकी के अगुआ टेड श्मिट कहते हैं, "मेरे विचार में मशीन लर्निंग में एक ऐसी गतिशीलता है जो संरक्षण के लिए वाकई बहुत लाभकारी है."
इस तरह की कई पहलें माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कई लाभ अर्जित करने वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों की अगुआई में या उनकी मदद से हो रही हैं.
जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट अपने एआई फॉर अर्थ कार्यक्रम के माध्यम से खून चूसने वाले कीड़ों को एकत्र करने, आनुवांशिक विश्लेषण में हुई प्रगति के माध्यम से उनके नमूनों की जांच करने और फिर रोग की उपस्थिति, कीड़ों के भोजन के तरीके और अन्य बातों के बारे में जानकारी देने वाले रोबोटिक फील्ड एजेन्ट बनाकर उनका प्रयोग कर रही है.
श्मिट बताते हैं, "ये लाभ अर्जित करने वाली कंपनियां एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकती हैं. तत्पश्चात हम और अन्य लोग इनका प्रयोग कर नवीनतम हल दे सकते हैं."
सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में वर्षा वनों को साफ कर एक जगह से धीमे स्वर में गड़गड़ाहट गूंजती है. पेड़ों के पीछे से भी कभी-कभी जंगल को चीरती हुई दहाड़ और कानों में गूंजने वाला विलाप निकलता है.
ये आवाज़ें इस ऊष्णकटिबंधीय भू-दृश्य पर बसने वाले जंगली हाथियों की आवाजें हैं. घने पेड़े-पौधों से छुपे ये हाथी पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के सवाना में मिलने वाले अपने भाईयों से छोटे और अधिक रहस्यमय होते हैं.
आमतौर पर ये दिखने से अधिक सुनाई देते हैं, लेकिन बढ़ते हुए शिकार से कम होती इनकी आबादी ने इन्हें संकट में डाल दिया है.
अब इन छुपे रुस्तम हाथियों द्वारा घने जंगल में एक-दूसरे से सम्पर्क में रखने के लिए निकाली गई आवाज़ें शोधकर्ताओं को इन जीवों को सुरक्षित रखने का उपकरण प्रदान कर रही हैं.
इन हाथियों की आवाज़ों की गुत्थी सुलझाने में लगी एक टीम में शामिल कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी पीटर रेगे बताते हैं, "हमारा उद्देश्य पृथ्वी के दूसरे सबसे बड़े ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों में भ्रमण करने वाली एक प्रमुख प्रजाति, इन जंगली हाथियों को बेहतर ढंग से समझना और उनकी रक्षा करना है. अस्तित्व बनाए रखने के उनके अवसर में सुधार के लिए हम टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं और इस तरह उनके वन की जैव विविधता को हम संरक्षित कर रहे हैं."
हाथियों का अस्तित्व बचाने के लिए काम करने वाली एक कंपनी कंज़र्वेशन मेट्रिक्स के साथ रेगे और उनके सहयोगियों ने मिलकर टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना शुरू किया.
इनका उद्देश्य हाथियों की स्थिति का पता लगाना - इनकी हत्या करने वाले शिकारियों को ढूंढना- जिससे कि जानवरों को सुरक्षित रखा जा सके. रीग और उनके सहयोगियों ने मध्य अफ्रीका के जंगलों से नौ लाख घंटों की रिकॉर्डिंग एकत्र की है जिनमें से हज़ारों घंटों की रिकॉर्डिंग में हाथियों की बातचीत के अंश हैं.
जैसे कि इन लोगों ने पाया कि छोटी आवृत्ति वाली गड़गड़ाहट की आवाज़ समूह को एक दूसरे के संपर्क में रखती है जबकि लम्बी आवृत्ति वाली बार-बार होने वाली गड़गड़ाहट अभिवादन का संकेत है.
इस तरह की अन्तर्दृष्टि हाथियों के संचार तंत्र के बारे में सुराग देती है, बल्कि सेंसरों द्वारा हाथियों की चेतावनी की आवाज़ या शिकारियों द्वारा की जाने वाली बंदूक की आवाज़ और बातचीत से वन रक्षकों को कुछ गड़बड़ होने की अग्रिम चेतावनी भी दे देती है.
रेगे का कहना है,"अभी यह देखना बाकी है कि क्या टेक्नोलॉजी अर्थपूर्ण भू-दृश्य के स्तर पर इनकी सुरक्षा संभव कर पाएगी - दसियों हजार किलोमीटर में फैले ऐसे क्षेत्र में जहां आम तरीके काम ही नहीं करते."
लेकिन शोधकर्ताओं ने शुरूआत बहुत अच्छी की है. उनके सबसे बड़े वर्तमान प्रोजेक्ट में 50 सेंसरों के एक बड़े ग्रिड की मदद से 1243 वर्ग किलोमीटर (480 वर्ग मील) में फैला जंगल शामिल है जिसमें हर तीन-चार महीने में होने वाली रिकॉर्डिंग 20 लाख गानों और आवाज़ों के बराबर है.
डीप लर्निंग नामक आर्टिफिशियल इंटलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से इतनी अधिक रिकॉर्डिंग और हाथियों की लगभग 15 हज़ार आवाज़ों का विश्लेषण करीब-करीब 22 दिनों में किया जा सकता है.
रेगे और उनके सहयोगी अब तत्काल जानकारी के लिए नमूनों का परीक्षण कर रहे हैं. अपने एआई फॉर अर्थ यानी पृथ्वी के लिए आर्टिफिशियल इंटलिजेंस कार्यक्रम की तरह ही 200 अन्य शोधों को मदद करने वाली माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मुख्य पर्यावरण अधिकारी लुकास जोप्पा बताते हैं, "एआई इन सब चीज़ों में हम लोगों को बहुत अधिक कार्यकुशल बना देती है. कोई भी इंसान बैठकर एक ऐसी भाषा में गाए गए उन 20 लाख गीतों को नहीं सुन सकता जिसकी भाषा ही वो नहीं समझता."
आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
संरक्षणकर्ता अब अधिक से अधिक टेक्नोलॉजी की क्षमता का सहारा लेकर अकल्पनीय रूप से अपने कार्य का विस्तार कर रहे हैं. जोप्पा के अनुसार आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
वे कहते हैं, "हम बहुत लम्बे समय से मशीन लर्निंग और संरक्षण की बात कर रहे थे. लेकिन पिछले कई वर्षों में हमने न केवल कोर लेवल एल्गॉरिथम - डीप न्यूरल नेटवर्क जैसी चीजों - में अविश्वसनीय प्रगति की है बल्कि संरक्षण के क्षेत्र में एल्गॉरिथम प्रशिक्षण के मामले में भी हम बेहतर हुए हैं."
मशीन लर्निंग और अन्य प्रकार के आर्टिफिशियल इंटलिजेंस हमें कैमरा ट्रैप, ध्वनि रिकॉर्डरों, सेंसरों, मानव निर्मित उपग्रहों और जंगलों में काम करने वाले लोगों से बड़े पैमाने पर मिलने वाले आंकड़ों के विश्लेषण का एक माध्यम उपलब्ध कराते हैं.
इस सारी जानकारी का विश्लेषण यदि कोई व्यक्ति करने बैठ जाए तो बहुत समय लग जाएगा. लेकिन आर्टिफिशियल इंटलिजेंस की मदद से यह केवल कुछ बटन दबाने से ही पूरा हो जाएगा.
एआई संरक्षणकर्ताओं को वह कुशलता और अनुपात उपलब्ध कराती है जिससे प्राकृतिक संसार में उन्हें अभूतपूर्व अन्तर्दृष्टि मिल जाती है, और इससे उनके कार्यक्षेत्र की पुरानी समस्या - जनधन की कमी - भी दूर हो जाती है.
हेलसिंकी विश्वविद्यालय के संरक्षण वैज्ञानिक एनरिको डी मिनिन इसके बारे में कहते हैं, "यदि संरक्षण के लिए संसाधन पर्याप्त होते, तो हम जैव विविधता के संकट का सामना न कर रहे होते."
डी मिनिन ऐसे मशीन लर्निंग एल्गोरिथम बना रहे हैं जो सोशल मीडिया पर अवैध वन्य जीव व्यापार से संबंधित पोस्ट की पहचान करने की क्षमता रखते हैं.
वे नैचुरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग, जो कि एआई का एक ऐसा रूप है जिससे मशीनें लिखित या मौखिक भाषा से जानकारी निकाल सकती हैं, का प्रयोग इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्मों पर आए संदेशों की भावना समझने के लिए कर रहे हैं.
जैसे कि आरम्भ में इस पद्धति से चीन और वियतनाम जैसे स्थानों में गैंडे के सींग के प्रयोग के बारे में आमराय जानने में मदद मिलेगी. उसके बाद इस जानकारी का उपयोग ऐसे प्रचार डिजाइन करने में किया जा सकेगा जिससे गैंडे के सींगों की मांग घटाई जा सके.
भविष्य में शायद कानून लागू करने संबंधी एजेन्सियां भी इस कार्यक्रम का उपयोग कर ऐसे देशों की पहचान कर सकेंगी जहां जानवरों का शिकार होता है और जहां शिकार के उत्पादों को प्रयोग में लाया जाता है. इससे इस व्यापार में उभरने वाले ट्रेंड यानी प्रचलन की पहचान हो सकेगी.
डी मिनिन बताते हैं, "मौजूदा काम में एजेन्सियों को सब कुछ हाथ से करना पड़ता है. एआई की मदद से हम अगले स्तर पर पहुंच जाएंगे जिसमें तुरंत संकट का विश्लेषण किया जा सकेगा."
इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
यहां से संभावनाएं विस्तृत ही होंगी. उदाहरण के लिए वाइल्ड मी नामक लाभ निरपेक्ष संगठन चीता, जिराफ, जेब्रा, ह्वेल शार्क और अन्य जीवों की कैमरा तस्वीरों और नागरिक वैज्ञानिकों द्वारा खींचे गए फोटो से कम्प्यूटर विज़न एल्गोरिथम का उपयोग कर तुरंत पहचान बता रहा है. इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
सिएटल में वल्कान इंक के लिए संरक्षण प्रौद्योगिकी के अगुआ टेड श्मिट कहते हैं, "मेरे विचार में मशीन लर्निंग में एक ऐसी गतिशीलता है जो संरक्षण के लिए वाकई बहुत लाभकारी है."
इस तरह की कई पहलें माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कई लाभ अर्जित करने वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों की अगुआई में या उनकी मदद से हो रही हैं.
जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट अपने एआई फॉर अर्थ कार्यक्रम के माध्यम से खून चूसने वाले कीड़ों को एकत्र करने, आनुवांशिक विश्लेषण में हुई प्रगति के माध्यम से उनके नमूनों की जांच करने और फिर रोग की उपस्थिति, कीड़ों के भोजन के तरीके और अन्य बातों के बारे में जानकारी देने वाले रोबोटिक फील्ड एजेन्ट बनाकर उनका प्रयोग कर रही है.
श्मिट बताते हैं, "ये लाभ अर्जित करने वाली कंपनियां एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकती हैं. तत्पश्चात हम और अन्य लोग इनका प्रयोग कर नवीनतम हल दे सकते हैं."
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